जय मॉ भगवती

आज इस मेले मै माननीय श्री हरीश रावत जी ( मुख्‍यमंंत्री )  और मननीय श्री हरीश धामी जी (वन निगम मंत्री ) भी यहॉ शिरकत कर रहें है । जिसके कारण यहा विशाल जनशैलाभ अाने के अंदेशा है  हर साल की तहर इस साल भी मेले का भव्‍य आयोजन किया जायेगा और रंगारंग कार्यक्रम स्‍थानीय कालाकारो द्वारा रखा गया है
मेले को देखने के लिये लोग दूर दूर से यहॉ आते है । यहॉ के स्‍थानीय लोग अपनी वेश भूषा में यहॉ आतें है और रंगारंग कार्यक्रम लोगो के सामने प्रस्‍तुत करते है ।


यह मन्दिर मुनस्यारी के दरकोट ग्राम में है । हर साल अनंत चतुरदशी के दिन एक भब्य मेले का आयोजन किया जाता है  । इस मेले को देखने के लिये लोग बहुत दूर दूर से आते है ,और जो भी लोग मुनस्यारी से बाहर होते है वो भी इस मेले के लिये घर आते है  ।



और दिन मे यहाँ के मंच मे रंग रंग कार्यक्रम किये जाते है , इस मेले मे कुमाउ की जलक दिखाइ देती है ।
दरकोट के निवासी इस मेले का आयोजन बडे धूम धाम से करते है ,
जब सभी दरकोट निवासी पूजा के लिये एक साथ घर से मंदिर के ओर आते है ,आगे आगे निशाँन ले के लोग ढोल दमाऊ के साथ ,सभी  झोडा चाचरी गाते हुवे मंदिर मैं आते है  ,और मन्दिर आ के पूजा सम्पन्न की जाती है

नंदा देवी मेला डानाधार मुनस्‍यारी 


                                                            जै नंदा माँ 

नंदा देवी समूचे गढ़वाल मंडल और कुमाऊं मंडल और हिमालय के अन्य भागों में जन सामान्य की लोकप्रिय देवी हैं।
नंदा की उपासना प्राचीन काल से ही किये जाने के प्रमाण धार्मिक ग्रंथों, उपनिषद और पुराणों में मिलते हैं। रुप मंडन में पार्वती को गौरी के छ: रुपों में एक बताया गया है।
भगवती की ६ अंगभूता देवियों में नंदा भी एक है। नंदा को नवदुर्गाओं में से भी एक बताया गया है।
 भविष्य पुराण में जिन दुर्गाओं का उल्लेख है उनमें महालक्ष्मी, नंदा, क्षेमकरी, शिवदूती, महाटूँडा, भ्रामरी, चंद्रमंडला, रेवती और हरसिद्धी हैं।
 शिवपुराण में वर्णित नंदा तीर्थ वास्तव में कूर्माचल ही है। शक्ति के रुप में नंदा ही सारे हिमालय में पूजित हैं।
नंदा के इस शक्ति रुप की पूजा गढ़वाल में करुली, कसोली, नरोना, हिंडोली, तल्ली दसोली, सिमली, तल्ली धूरी, नौटी, चांदपुर, गैड़लोहवा आदि स्थानों में होती है।
गढ़वाल में राज जात यात्रा का आयोजन भी नंदा के सम्मान में होता है।
कुमाऊँ में अल्मोड़ा, रणचूला, डंगोली, बदियाकोट, सोराग, कर्मी, पोथिंग, चिल्ठा, सरमूल आदि में नंदा के मंदिर हैं।
अनेक स्थानों पर नंदा के सम्मान में मेलों के रुप में समारोह आयोजित होते हैं। नंदाष्टमी को कोट की माई का मेला और नैतीताल में नंदादेवी मेला
अपनी सम्पन्न लोक विरासत के कारण कुछ अलग ही छटा लिये होते हैं परन्तु अल्मोड़ा नगर के मध्य में स्थित ऐतिहासिकता नंदादेवी मंदिर में प्रतिवर्ष भाद्र मास
की शुक्ल पक्ष की अष्टमी को लगने वाले मेले की रौनक ही कुछ अलग है।
लोक इतिहास के अनुसार नन्दा गढ़वाल के राजाओं के साथ-साथ कुँमाऊ के कत्युरी राजवंश की ईष्टदेवी थी।
ईष्टदेवी होने के कारण नन्दादेवी को राजराजेश्वरी कहकर सम्बोधित किया जाता है। नन्दादेवी को पार्वती की बहन के रुप में देखा जाता है
परन्तु कहीं-कहीं नन्दादेवी को ही पार्वती का रुप माना गया है। नन्दा के अनेक नामों में प्रमुख हैं शिवा, सुनन्दा, शुभानन्दा, नन्दिनी।
 पूरे उत्तराँचल में समान रुप से पूजे जाने के कारण नन्दादेवी के समस्त प्रदेश में धार्मिक एकता के सूत्र के रुप में देखा गया है।


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