महान स्वतंत्रता संग्राम सेनानी को हमारा शत शत नमन। श्री नरी राम विश्वकर्मा जी जीवन परिचय (5 जुलाई 1905 - 8 अप्रैल 1981) श्री नरी राम विश्वकर्मा जी का जन्म 5 जुलाई 1905 में नरी राम जी पुत्र कीट राम जी के घर जोहार मुनस्यारी के बुर्फू गाँव मे हुआ था ,नरी राम जी की शिक्षा तल्ला जोहार (बमोरी) में हुई । 1938 में इन्होंने कांग्रेस की सदस्यता ली और बढ चढ़ कर कांग्रेस के कार्यक्रमों में भाग लेना शुरु कर दिया जिस कारण अंग्रेजो ने इनको अपने नज़र में रखे रखा और उनको गिरफ्तार करने के लिए एक मौका तलाशने लगे। इनका कार्य क्षेत्र मुख्यतः गराई गंगोली था वहीं से उन्होंने महात्मा गाँधी जी के साथ जाकर सत्याग्रह आन्दोलन में भाग लिया और अंग्रेजो के खिलाफ अन्दोलन किया । अंग्रेजो को तो उन्हें गिरफ्तार करने के लिए एक मौके की तलाश थी 24 फरवरी 1941 को श्री नरी राम विश्वकर्मा जी को अंग्रेजी सरकार ने गिरफ्तार कर के जेल मे डाल दिया अंग्रेजी सरकार को उनकी माली हालत के बारे मे पता था और उनको दिनाकं 28 अप्रैल 1941 को 5 रुपये का जुर्माना लगाया गया जुर्माना ना भरने पर उनके घर से सामानों (एक थुल्मा ,एक दन ,एक पंखी = 60 रुपए ) की कुर्की (नीलामी ) कर दी गयी और नीलामी के दौरान उनके घर से ताबे का एक लोटा गलती से लुड़क कर पडोसी के खेत में जाकर गिरा और आज भी वह लोटा उनके घर पर मौजूद है ।। अंग्रेजी सरकार के खिलाफ लगातार आन्दोलन से उनके विरुद्ध 05 मार्च 1941 को नोटिस जारी किया गया लेकिन उन्होंने उस नोटिस का बहिस्कार किया जिस कारण उनको 7 मार्च 1941 को अल्मोड़ा जेल डाल दिया गया 21 मार्च 1941 को अल्मोड़ा से हटा कर जिला जेल बरेली भेज दिया गया और नगत जुर्माना ना भरने पर राच हत्कार्घा चरखा , खाना बनाने के बर्तन नीलम कर दिए गए और 60 रुपये भी जुर्माना लगाया गया, संपूणानन्द बहुगुणा पूर्व मुख्यमंत्री उत्तर प्रदेश के साथ भी वो जेल मे रहे । उनके परम मित्र श्री हरीश सिंह जंगपांगी जी जो की दुम्मर रहते थे उनके कहने पर सन 1944 में गाँधी नगर गाँव आये और यहाँ लोगो को बसाया । देश मे स्वतंत्रता आंदोलन अपनी चरम सीमा पर था और वह भी गाँधी जी के साथ आंदोलनों मे अपनी भागीदारी दे रहे थे और देश के सभी अन्दोलनकारियों की सहायता से 15 अगस्त 1947 को भारत को आज़ादी मिली, सन 1948 में वो जिलाबोर्ड अल्मोड़ा के सदस्य भी रहे ।। आजादी के बाद जब वो अपने घर वापस आये तो उनकी दो पत्नियों ( आनन्दी देवी और पदिमा देवी ) से एक भी संतान प्राप्त नहीं हुवा था और वो संतान की प्राप्ति के लिए कैलाश चले गए और वहाँ भोलेनाथ की गुफा मैं तपस्या की और कुछ समय बाद वो अपने घर वापस आ गए और सन 1962 में पुत्र श्री रंजीत विश्वकर्मा रत्न की प्राप्ति हुवी,8 अप्रैल 1981 को उनका बीमारी के चलते देहांत हो गया ।।

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