होली की हार्दिक शुभकामनाएँ
होली रंगों का एक प्रसिद्ध त्योहार है  यह पर्व हिंदू पंचांग के अनुसार फाल्गुन मास की पूर्णिमा को मनाया जाता है। ये ढ़ेर सारी मस्ती और खिलवाड़ का त्योहार है खास तौर से बच्चों के लिये जो होली के एक हफ्ते पहले और बाद तक रंगों की मस्ती में डूबे रहते है। हिन्दु धर्म के लोगों द्वारा इसे पूरे भारतवर्ष में मार्च के महीने में मनाया जाता है खासतौर से उत्तर भारत में।
सालों से भारत में होली मनाने के पीछे कई सारी कहानीयाँ और पौराणिक कथाएं है। इस उत्सव का अपना महत्व है, हिन्दु मान्यतों के अनुसार होली का पर्व बहुत समय पहले प्राचीन काल से मनाया जा रहा है जब होलिका अपने भाई के पुत्र को मारने के लिये आग में लेकर बैठी और खुद ही जल गई। उस समय एक राजा था हिरण्यकशयप जिसका पुत्र प्रह्लाद था और वो उसको मारना चाहता था क्योंकि वो उसकी पूजा के बजाय भगवान विष्णु की भक्ती करता था। इसी वजह से हिरण्यकशयप ने होलिका को प्रह्लाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठने को कहा जिसमें भक्त प्रह्लाद तो बच गये लेकिन होलिका मारी गई।
जबकि, उसकी ये योजना भी असफल हो गई, क्योंकि वो भगवान विष्णु का भक्त था इसलिये प्रभु ने उसकी रक्षा की। षड़यंत्र में होलिका की मृत्यु हुई और प्रह्लाद बच गया। उसी समय से हिन्दु धर्म के लोग इस त्योहार को मना रहे है। होली से ठीक एक दिन पहले होलिका दहन होता है जिसमें लकड़ी, घास और गाय के गोबर से बने ढ़ेर में इंसान अपने आप की बुराई भी इस आग में जलाता है। होलिका दहन के दौरान सभी इसके चारों ओर घूमकर अपने अच्छे स्वास्थय और यश की कामना करते है साथ ही अपने सभी बुराई को इसमें भस्म करते है। इस पर्व में ऐसी मान्यता भी है कि सरसों से शरीर पर मसाज करने पर उसके सारे रोग और बुराई दूर हो जाती है साथ ही साल भर तक सेहत दुरुस्त रहती है।
होलिका दहन की अगली सुबह के बाद, लोग रंग-बिरंगी होली को एक साथ मनाने के लिये एक जगह इकठ्ठा हो जाते है। इसकी तैयारी इसके आने से एक हफ्ते पहले ही शुरु हो जाती है, फिर क्या बच्चे और क्या बड़े सभी बेसब्री से इसका इंतजार करते है और इसके लिये ढ़ेर सारी खरीदारी करते। यहाँ तक कि वो एक हफ्ते पहले से ही अपने दोस्तों, पड़ोसियों और प्रियजनों के साथ पिचकारी और रंग भरे गुब्बारों से खेलना शुरु कर देते। इस दिन लोग एक-दूसरे के घर जाकर रंग गुलाल लगाते साथ ही मजेदार पकवानों का आनंद लेते।


भाजपा के विरोध मैं कॉंग्रेस कार्यकर्ताओ  ने मदकोट चौराहे मे भाजपा का पुतला फूका ,और मुनस्यारी मैं भी इसका  असर देखा गया , मुनस्यारी मैं शास्त्री चौक पर कॉंग्रेस कार्यकर्ताओ  ने  भाजपा का पुतला फूका।
कांग्रेस सरकार में बगावत से उपजे राजनैतिक हालात में अगर कोई सवाल सबको मथ रहा है, तो वह यह कि अब उत्तराखंड में भावी सियासी परिदृश्य क्या होगा। क्या हरीश रावत सरकार इस बगावत से सफलतापूवर्क उबर सकेगी और कांग्रेस के नौ बागी विधायकों की सदस्यता खतरे में पड़ जाएगी। राज्य गठन के बाद पहली दफा उत्तराखंड क्या राष्ट्रपति शासन के हवाले हो जाएगा या भाजपा एक साल की अल्पावधि के लिए
 सरकार बनाने को तैयार हो जाएगी। यह भी मुमकिन है कि कांग्रेस के नौ बागियों को सरकार बनाने के लिए भाजपा बाहर से समर्थन दे।
उत्तराखंड में शुक्रवार शाम से राजनैतिक घटनाक्रम तेजी से घूमा। विधानसभा में विनियोग विधेयक पारित करने को लेकर हुए बवाल में कांग्रेस के नौ विधायकों ने बगावत कर दी। एक मनोनीत विधायक समेत 71 सदस्यीय विधानसभा में विनियोग विधेयक के दौरान कुल 68 सदस्य उपस्थित थे।
 भाजपा के कुल 28 विधायकों में से सदन में मौजूद 26 विधायकों के साथ कांग्रेस के नौ बागियों के आ मिलने से विधायकों का आंकड़ा 35 तक पहुंच गया।
 उधर, कांग्रेस इस स्थिति में 27 विधायकों के आंकड़े पर आ ठहरी। इसके अलावा सरकार को समर्थन दे रहे प्रोग्रेसिव डेमोक्रेटिक फ्रंट के छह विधायकों समेत कांग्रेस के पाले में कुल 33 विधायक हुए।
दिलचस्प बात यह कि शुक्रवार को सदन में गैरहाजिर भाजपा के दो विधायकों में से एक भीमलाल आर्य कांग्रेस की तरफ नजर आ रहे हैं जबकि एक अन्य बसपा विधायक पीडीएफ का हिस्सा हैं। यानी, इन दोनों को मिलाकर भी कांग्रेस के पास ताजा हालात में 35 ही विधायक हो रहे हैं, जो बहुमत के 36 के आंकड़े से एक कम है। उधर, भाजपा विधायक गणेश जोशी न्यायिक हिरासत में हैं और उनकी मौजूदगी में भाजपा 36 का आंकड़ा छू लेगी। दरअसल, आंकड़ों के इस मजेदार खेल ने सूबे की सियासत में तमाम विकल्प खड़े कर दिए हैं। मसलन, राज्यपाल द्वारा मुख्यमंत्री हरीश रावत को 28 मार्च  तक बहुमत साबित करने के निर्देश दिए गए हैं। यानी, हरीश रावत सरकार उसी स्थिति में बच सकती है अगर कांग्रेस के नौ बागियों की सदस्यता व्हिप के
 उल्लंघन के आरोप में खत्म हो जाए। अगर ऐसा नहीं होता तो सरकार चली जाएगी।
इन तमाम हालात में सूबे में राष्ट्रपति शासन एक बड़ा विकल्प हो सकता है। वह इसलिए, क्योंकि जरूरी नहीं कि भाजपा महज एक साल के लिए बागियों की मदद से सरकार बनाना ही चाहे। इसके भी कारण हैं। एक तो भाजपा को उस स्थिति में कांग्रेस सरकार के चार साल की एंटी इनकमबेंसी अपने सिर लेनी पड़ सकती है,
 जो वह कतई गवारा नहीं करेगी। दूसरे इन नौ बागियों को सरकार में एडजस्ट करने के लिए ऐसा फार्मूला तलाशना होगा, जो सर्वमान्य हो। यही नहीं, भाजपा अगर सरकार बनाती है
 तो उस पर जुगाड़ तंत्र से सरकार चलाने का आरोप चस्पा हो सकता है। सबसे बड़ी बात, हरीश रावत की छवि सियासत में जबरन शहीद कर दिए गए एक मुख्यमंत्री की बन सकती है, जो उनके पक्ष में सहानुभूति लहर का सबब बनेगी।इसके उलट सोचा जाए तो, अगर राष्ट्रपति शासन के हालात पैदा होते हैं तो भाजपा केंद्र में अपनी सरकार होने के कारण इसका लाभ लेने की स्थिति में होगी। तब, राज्यपाल की भूमिका ही महत्वपूर्ण होगी और भाजपा केंद्र की तमाम योजनाओं का त्वरित क्रियान्वयन करा इसका अपने पक्ष में फायदा ले सकती है। यही नहीं, वर्ष 2017 में विधानसभा चुनाव में जाने से पहले भाजपा, कांग्रेस के चार साल के शासन के तमाम मुद्दों, मसलन घोटाले और भ्रष्टाचार के आरोप, कानून-व्यवस्था का सवाल, कमजोर वित्तीय हालात आदि पर कांग्रेस के खिलाफ माहौल तैयार करने की रणनीति अख्तियार कर सकती है। अलबत्ता, इस सबके अलावा एक विकल्प कांग्रेस के बागियों को सरकार बनाने का मौका देकर बाहर से समर्थन देने का भी। हालांकि इसकी संभावना सबसे कम समझी जा रही है।
मुनस्यारी मैं भी होली का त्यौहार धूम धाम से मनाई जाती है , और होली सब के घर घर जाती है ,सब के घरो मे होली का स्वागत किया जाता है ,और खाने मैं कोकल ,आलू के गुटके ,चने ,पापड आदि होल्यारों अर्थात होली के झुण्ड को दिया जाता है जिसमे बुजुर्ग आगे चीर पकड़ कर जाते है और होली का गीत गाते है।साथ ही पीने के लिए ,पहाड़ी बीयर (जान ) ,और भांग दिया जाता है।  नयाबस्ती ,जलथ, सुरिंग ,दरकोट ,धापा ,गोरीपार ,मदकोट ,व जगहों पर धूम धाम से मनाया जाता है।  

वैसे तो होली लगभग सभी जगह बड़ी ही धूम-धाम से मनाई जाती है, पर उत्तराखंडी होली की बात ही कुछ और है. होली हो और उसमें संगीत की बात न हो सुनने में कुछ फीका सा लगता है। संगीत के बिना होली का आनंद न के बराबर लगता है.इसलिए उत्तराखंडी होली में संगीत का अपना एक विशेष स्थान है
होली में संगीत के समावेश से इसका आनंद दो गुना हो जाता है|   

   उत्तराखंड में तीन प्रकार की होली मनाई जाती है. 
   १-खड़ी होली 
   २- बैठक होली 
   ३- महिला होली .
   कुछ स्थानों में खड़ी होली को “बंजारा होली” के नाम से भी पुकारा जाता है. खड़ी होली में मुख्यतः सभी पुरुष भाग लेते हैं. 
   बैठक होली पुरुषों और महिलाओं दोनों के द्वारा मनाई जाती है. महिला होली जैसा कि नाम से ही पता चलता है केवल महिलाओं के लिए होती है. उत्तराखंड में मुख्य होली का प्रारंभ फाल्गुन मास की एकादशी से होता है . इस दिन भद्रारहित काल में देवी-देवताओं पर रंग डालकर पारंपरिक तरीके  से विधिपूर्वक चीर बांधी जाती है. चीर बांधने के लिए पद्म्न की एक टहनी (जिसे उत्तराखंड में ‘पैयाँ’ के नाम से जाता जाता है) पर रंग-बिरंगे कपड़ों के कुछ टुकड़े बांधे जाते हैं चीर बांधने के लिए किसी ब्राह्मन को बुलाया जाता है जो विधिपूर्वक मंत्रौच्चार करते हुए चीर बंधन करता है . चीरबंधन के लिए हमारे पूर्वजों द्वारा एक स्थान निश्चित किया हुआ होता है जिसे उत्तराखंडी भाषा में ‘खई’ या ‘खोई’ के नाम से पुकारा जाता है 
   हर वर्ष चीर वहीँ पर बांधी जाती है और होली की शुरुआत भी वहीँ से की जाती है. होली के दौरान किये जाने वाले सभी महत्वपूर्ण कार्य यहीं पर संपन्न किये जाते हैं. चीर बांधने का कार्य पूरा होने के बाद लोगों या ‘होल्यारों’ द्वारा अपने होली के कपड़ों पर रंग डाला जाता है. होली में मुख्यतः सफ़ेद कुर्ता पायजामा पहना जाता है और सर पर गाँधी टोपी पहनी जाती है. कहीं-कहीं पर जिसके पास अपनी व्यक्तिगत चीर नहीं होती है वहां पर सामूहिक रूप से चीर बांधी जाती है. यह चीर बांस के डंडों पर बांधी जाती है,जिसमें पैयाँ की एक टहनी,
   जों की कुछ बालियाँ और खीशे के फूल का होना जरूरी होता है.   
   पुराने समय से चीर बांधने की अनुमति कुछ ही गावों को है हमारे पूर्वज चीर को शक्ति का प्रतीक मानते थे जिस गाँव के पास अपनी चीर होती थी उस गाँव को शक्तिशाली गाँव के रूप में देखा जाता था. चीर के सन्दर्भ में ऐसा माना जाता है कि यदि इसके धागे या कतरे को किसी दुसरे गाँव द्वारा चुरा लिया जाता है तो चीर उस गाँव की हो जाती थी जिसके द्वारा यह चुरायी जाती थी और चोरी किये जाने वाले गाँव से चीर बांधने का अधिकार छिन जाता था इसलिए जिस गाँव में चीर बांधी जाती है उस गाँव के लोग रात भर इसका पहरा देते हैं,जिससे कि कोई इसे चुरा न ले जाय. वैसे बैठक होली की शुरुआत पौष मास के प्रथम रविवार से मानी जाती है परन्तु उत्तराखंड में बैठक होली की शुरुआत बसंत पंचमी से होती है.पौष मास में इसका स्वरुप और कथ्य कुछ और होता है जो समय के साथ-साथ बदलते रहता है, बसंत पंचमी तक केवल आध्यात्म से सम्बंधित होली गाई जाती है  जो शिवरात्र तक आते-आते अर्द्ध-श्रंगारिक हो जाता है,शिवरात्र के बाद पुर्णतः श्रृंगार में डूबी हुई होली गाई जाती है. बैठक होली में लगभग सभी रसों का समावेश पाया जाता है जिसमें भक्ति,छेड़-छाड़,वैराग्य,विरह,हंसी-ठिठोली,गोपी कृष्ण प्रेम,प्रेमी-प्रेमिका की तकरार- तकरार,पति- पत्नी का विरह,देवर-भाभी की छेड़-छाड़ आदि प्रमुख हैं, होली का आह्वाहन राग धमार से किया जाता है. पहली होली राग श्याम-कल्याण में गायी जाती है समापन राग भैरवी पर होता है, दादरा,कहरवां लगभग सभी तालों में होली गाई जाती हैं. प्रसिद्द साहित्यकार मनोहर श्याम जोशी के शब्दों में “होली जैसे धमाल भरे त्यौहार को बैठक होली गरिमा प्रदान करती है ”   
   उत्तराखंड में गंगोलीहाट,अल्मोड़ा,लोहाघाट,चम्पावत,पिथौरागढ़,और नैनीताल अपनी शास्त्रीय होली के लिए प्रसिद्द हैं,खड़ी होली गाने का अपना एक विशेष अंदाज़ होता है. लोग एक गोल घेरे में २ अलग-अलग ग्रुप बनाकर ताल से ताल मिलाकर होली गाते हैं ,होली के संचालन के लिए गाँव के किसी सयाने व्यक्ति को एक विशेष पद दिया जाता है जिसे कुमाऊ में ‘डांगर’ कहते हैं . होली की शुरुआत डांगर करता है 
   और फिर बारी-बारी से लोग होली गाते हैं. सभी लोग ‘डांगर’ की बात मानते हैं और उसी के अनुसार होली गायी जाती है. जब होली किसी के आँगन में जाती है ,तो सबसे पहले ‘चीर’ पूजन होता है उसके बाद सभी ‘होल्यारों’ को अबीर लगाया जाता है और जोश और उमंग के साथ होली गायी जाती है .   
   शहरों में सिर्फ एक दिन की होली मनाई जाती है परन्तु उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में लगभग ४-५ दिनों तक होली मनाई जाती है इन ४-५ दिनों तक सम्पूर्ण  उत्तराखंड होली के रंगों में रंग जाता है. दिन में बारी-बारी से सभी के घरों में जाकर खड़ी होली गाई जाती है और रात में ‘खई’ में पहले खड़ी चौताल होली और
   बाद में बैठक होली गाई जाती है. होली का समापन ‘छरड़ी’ के साथ होता है इस दिन होली के रंग को नदी में बहाकर तथा नहा-धोकर ‘खई’ में ‘हलुवा’  बनाया जाता है जिसमें चीर के धागे का एक-एक टुकड़ा रखकर सभी ‘होल्यारों’ के घरों को प्रसाद के रूप में दिया जाता है. होली के बाद उत्तराखंड में झोड़े प्रारंभ हो जाते हैं. 

                                                               खलिया टॉप मुनस्यारी
यह नज़ारा खलिया टॉप मुनस्यारी का है , १६ को हुवी बर्फ बारी की यह तस्वीर टी ० आर ० सी की है। अभी भी यहाँ बर्फ है ,कल रात भी भी बर्फ पडी है. जिसका असर आज मुनस्यारी मे हो  रहा है,अर्थात मौसम शुष्क बना हुवा है,  ठंड भी बहुत हो रहे है ,दिन मै तो तो फिर भी ठीक ही है लेकिन रात को और प्रातः काल काफी ठण्ड महसूस हो रही है।
               आज कल मौसम दिन मैं ठीक हो रहा है लेकिन शाम होते ही बर्फबारी  का मौसम बन जा रहा है।


पंचचूली मुनस्यारी का यह मनमोहक नज़ारा आज का है।   लगातार बारिश और बर्फ़बारी से आज राहत मिली , खलियाटॉप ,राजरम्भा ,पंचचूली मैं अत्यधिक मात्र मैं बर्फ बारी हुवी है ,जिसके कारण  मुनस्यारी मे ठंडी हवा  चल रही है और ठण्ड भी बड़ रही है।  आज का दिन मौसम के हिसाब से से अच्छा रहा क्योंकी आज  दिन भर अच्छी धुप रहे और ठंडी हवा भी काम ही चली। 

फुलदेई  (फुल - फुल त्यार )
फुलदेई  (फुल - फुल त्यार की हार्दिक शुभकामनाये ) चैत्र मास मे मनाया जाने वाला यह उत्सव पूरे माह चलता है और वैशाखी (बिखैती ) के दिन देहरी मे फूल डालने वाले बच्चो के माध्यम से दोहरी की पूजा होती है और इसे बैसाख माह मे आरम्भ होने वाले कौथिग के आगमन का संकेत माना जाता है।  साथ ही इसका सम्बन्ध नववर्ष के आगमन से भी है।
  कुमाऊं में आज के दिन देली पूजन की परंपरा रही है। बच्चे थाली में फूल और अक्षत लेकर हर घर की देली (देहरी) पूजन के लिए उत्साह के साथ निकले। फुलदेई, फुलदेई, छम्मा देई, छम्मा देई, दैणी द्वार, भर भकार, यो देली सौं, बारंबार नमस्कार (अर्थात देहरी में फूल डाल रहे हैं, यह द्वार भंडार भरे, इस देहरी को बार बार नमस्कार)। बच्चों को देली पूजन के बदले गुड़, पैसे, चावल आदि सामग्री दी जाती है। 
चैत्र हिंदू पंचांग के अनुसार पहला महीना होता है। बसंत ऋतु का आगमन होने लगता है। विभिन्न प्रकार के फूल खिलने लगते हैं। चैत्र को पवित्र महीना कहा जाता है। इस महीने देवी देवताओं की पूजा के अनुष्ठान होते हैं। इस कारण भी चैत्र का बड़ा महत्व है। फुलदेई की परंपरा गांवों में आज भी जीवित है। बालिकाओं ने गांव के हर घर में जाकर द्वार पूजा की। शहरों में भी थोड़ा बहुत इस परंपरा का अस्तित्व बचा हुआ है। कम से कम अपने पड़ोस के घरों की देहरी का पूजन बालिकाएं जरूर करती हैं। मुनस्यारी, गोरीपार, दरकोट, धापा, सरमोली, समकोट, कोटापन्द्रहपाला, बासबगड़, नाचनी, मदकोट, थल, में फुलदेई का पर्व उल्लास के साथ मनाया गया।
मुनस्यारी में आज फूल देई पर्व उल्लास के साथ मनाया जा रहा है । छोटे बच्चे विशेषकर कन्याओं ने घरों में जाकर देहरी का पूजन कर रही  हैं । बच्चों फुल -फुल कहते हुए पुष्प और अक्षतों से देहरी को पूजा कर रहे है । चैत्र संक्रांति को मनाए जाने वाली फूल देई को खुशहाली और समृद्धि से भी जोड़ा जाता है।


                                                                          'पंचचूली ' 
यह अदभुद नज़ारा पंचचूली का आज का है । जिसमें पंचचूली ,हंसलिंग ,खलियाटॉप  बादलो से ढका हुवा है और लगातार बर्फ़बारी हिमालय पर हो रही है ,बलाती फार्म तक  बर्फ पहुँच चुकी है मौसम बहुत ही ठंडा बना हुवा है ,रात को मुनस्यारी के बाज़ार तक बर्फ पड़ सकती है।   
‘महाशिवरात्रि’ के इस परम-पावन पर्व पर “अच्छीखबर-परिवार” के सभी सदस्यों को ढेर सारी शुभ कामनाएँ | मित्रों, कुछ विद्वानों का मत है कि आज ही के दिन शिवजी और माता पार्वती विवाह-सूत्र में बंधे थे जबकि अन्य कुछ विद्वान् ऐसा मानते हैं कि आज के ही दिन शिवजी ने ‘कालकूट’ नाम का विष पिया था जो सागरमंथन के समय अमृत से पहले समुद्र से निकला था |स्मरणीय है कि यह समुद्रमंथन देवताओं और असुरों ने अमृत-प्राप्ति के लिए मिलकर किया था |एक शिकारी की कथा भी इस त्यौहार के साथ जुड़ी  हुई है कि कैसे उसके अनजाने में की गई पूजा से प्रसन्न होकर भगवान् शिव ने उस [शिकारी] पर अपनी असीम कृपा बरसाई थी | वही पौराणिक कथा, आज मैं संक्षेप में, आपसे शेयर कर रही हूँ जो “शिव पुराण” में संकलित है ….
प्राचीन काल में ,किसी जंगल में गुरुद्रुह नाम का एक शिकारी रहता था जो जंगली जानवरों के शिकार द्वारा अपने परिवार का भरण-पोषण किया करता था |एक बार शिव-रात्रि के दिन ही   जब वह शिकार के लिए गया ,तब संयोगवश पूरे दिन खोजने के बाद भी उसे कोई जानवर शिकार के लिए न मिला, चिंतित हो कर कि आज उसके बच्चों, पत्नी एवं माता-पिता को भूखा रहना पड़ेगा, वह सूर्यास्त होने पर भी एक जलाशय के समीप गया और वहां एक घाट के किनारे एक पेड़ पर अपने साथ थोड़ा सा जल पीने के लिए लेकर, चढ़ गया क्योंकि उसे पूरी उम्मीद थी कि कोई न कोई जानवर अपनी प्यास बुझाने के लिए यहाँ ज़रूर आयेगा |वह पेड़ ‘बेल-पत्र’ का था और इसके नीचे शिवलिंग भी था जो सूखे बेलपत्रों से ढक जाने के कारण दिखाई नहीं दे रहा था |
    रात का पहला प्रहर बीतने से पहले ही एक हिरणी वहां पर पानी पीने के लिए आई |उसे देखते ही शिकारी ने अपने धनुष पर बाण साधा |ऐसा करते हुए,उसके हाथ के धक्के से कुछ पत्ते एवं जल की कुछ बूंदे पेड़ के  नीचे बने शिवलिंग पर गिरीं और अनजाने में ही शिकारी की पहले प्रहर की पूजा हो गयी |हिरणी ने जब पत्तों की खड़खड़ाहट सुनी ,तो घबरा कर ऊपर की ओर देखा और भयभीत हो कर,  शिकारी से , कांपते हुए बोली- ‘मुझे मत मारो |’ शिकारी ने कहा कि वह और उसका परिवार भूखा है इसलिए वह उसे नहीं छोड़ सकता |हिरणी ने शपथ ली कि वह अपने बच्चों को अपने स्वामी को सौंप कर लौट आयेगी| तब वह उसका शिकार कर ले |शिकारी को उसकी बात का विश्वास नहीं हो रहा था |उसने फिर से शिकारी को यह कहते हुए अपनी बात का भरोसा करवाया कि जैसे सत्य पर ही धरती टिकी है; समुद्र मर्यादा में रहता है और झरनों से जल-धाराएँ गिरा करती हैं वैसे ही वह भी सत्य बोल रही है | क्रूर होने के बावजूद भी, शिकारी को उस पर दया आ गयी और उसने ‘जल्दी लौटना’ कहकर ,उस हिरनी को जाने दिया |
थोड़ी ही देर गुज़री कि एक और हिरनी वहां पानी पीने आई, शिकारी सावधान हो , तीर सांधने लगा और ऐसा करते हुए ,उसके हाथ के धक्के से फिर पहले की ही तरह थोडा जल और कुछ बेलपत्र नीचे शिवलिंग पर जा गिरे और अनायास ही शिकारी की दूसरे प्रहर की पूजा भी हो गयी |इस हिरनी ने भी भयभीत हो कर, शिकारी से जीवनदान की याचना की लेकिन उसके अस्वीकार कर देने पर ,हिरनी ने उसे लौट आने का वचन, यह कहते हुए दिया कि उसे ज्ञात है कि जो वचन दे कर पलट जाता है ,उसका अपने जीवन में संचित पुण्य नष्ट हो जाया करता है | उस शिकारी ने पहले की तरह, इस हिरनी के वचन का भी भरोसा कर उसे जाने दिया |
अब तो वह इसी चिंता से व्याकुल हो रहा था कि उन में से शायद ही कोई हिरनी लौट के आये और अब उसके परिवार का क्या होगा |इतने में ही उसने जल की ओर आते हुए एक हिरण को देखा, उसे देखकर वनेचर (शिकारी ) को बड़ा हर्ष हुआ ,अब फिर धनुष पर बाण चढाने से उसकी तीसरे प्रहर की पूजा भी स्वतः ही संपन्न हो गयी लेकिन पत्तों के गिरने की आवाज़ से वह हिरन सावधान हो गया |उसने व्याध (शिकारी ) को देखा और पूछा –“क्या करना चाहते हो ?” वह बोला-“अपने कुटुंब को भोजन देने के लिए तुम्हारा वध करूंगा |” वह मृग प्रसन्न हो कर कहने लगा – “मैं धन्य हूँ कि मेरा ये हृष्ट-पुष्ट शरीर किसी के काम आएगा, परोपकार से मेरा जीवन सफल हो जायेगा लेकिन एक बार मुझे जाने दो ताकि मैं अपने बच्चों को उनकी माता के हाथ में सौंप कर और उन सबको धीरज बंधा कर यहाँ लौट आऊं |” शिकारी का ह्रदय, उसके पापपुंज नष्ट हो जाने से अब तक शुद्ध हो गया था इसलिए वह कुछ विनम्र वाणी में बोला –‘ जो-जो यहाँ आये ,सभी बातें बनाकर चले गये और अब तक नहीं लौटे ,यदि तुम भी झूठ बोलकर चले जाओगे ,तो मेरे परिजनों का क्या होगा ?” अब हिरन ने यह कहते हुए उसे अपने सत्य बोलने का भरोसा दिलवाया कि यदि वह लौटकर न आये; तो उसे वह पाप लगे जो उसे लगा करता है जो  सामर्थ्य रहते हुए भी दूसरे का उपकार नहीं करता | व्याध ने उसे भी यह कहकर जाने दिया कि ‘शीघ्र लौट आना |’
 रात्रि का अंतिम प्रहर शुरू होते ही उस वनेचर के हर्ष की सीमा न थी क्योंकि उसने उन सब हिरन-हिरनियों को अपने बच्चों सहित एकसाथ आते देख लिया था |उन्हें देखते ही उसने अपने धनुष पर बाण रखा और पहले की ही तरह उसकी चौथे प्रहर की भी शिव-पूजा संपन्न हो गयी | अब उस शिकारी के शिव कृपा से सभी पाप भस्म हो गये इसलिए वह सोचने लगा-‘ओह, ये पशु धन्य हैं जो ज्ञानहीन हो कर भी अपने शरीर से परोपकार करना चाहते हैं लेकिन धिक्कार है मेरे जीवन को कि मैं अनेक प्रकार के कुकृत्यों से अपने कुटुंब का पालन करता रहा |’ अब उसने अपना बाण रोक लिया तथा सब मृगों को यह कहकर कि ‘वे धन्य हैं’;  वापिस जाने दिया |उसके ऐसा करने पर भगवान् शंकर ने प्रसन्न हो कर तत्काल उसे अपने दिव्य स्वरूप का दर्शन करवाया तथा उसे सुख-समृद्धि का वरदान देकर “गुह’’ नाम प्रदान किया |मित्रों, यही वह गुह था जिसके साथ भगवान् श्री राम ने मित्रता की थी |
मित्रों, अंतत:, यही कहना चाहती हूँ कि जटाओं में गंगाजी को धारण करने वाले, सिर पर चंद्रमा को सजाने वाले,मस्तक पर त्रिपुंड तथा तीसरे  नेत्र वाले ,कंठ में कालपाश [नागराज] तथा रुद्रा- क्षमाला से सुशोभित , हाथ में डमरू और त्रिशूल है जिनके  और भक्तगण बड़ी  श्रद्दा से  जिन्हें  शिवशंकर, शंकर, भोलेनाथ, महादेव, भगवान् आशुतोष, उमापति, गौरीशंकर, सोमेश्वर, महाकाल, ओंकारेश्वर, वैद्यनाथ, नीलकंठ, काशीविश्वनाथ, त्र्यम्बक, त्रिपुरारि, सदाशिव तथा अन्य सहस्त्रों नामों से संबोधित कर उनकी पूजा-अर्चना किया करते हैं —– ऐसे भगवान् शिव एवं शिवा हम सबके चिंतन को सदा-सदैव सकारात्मक बनायें एवं सबकी मनोकामनाएं पूरी करें |  
कुमाऊँ यूनिवर्सिटी नैनीताल की एम ० ए प्रथम और तृतीय की नयी स्कीम डाउनलोड करे ।(२०१६)









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