जय महाकाली 
महाकाली  मन्दिर दरांती मुनस्यारी 
हर साल दरांती के महाकाली मन्दिर पूजा का आयोजन किया जाता है ,ढोल नगाडो की आवाज मैं पूरा समां गुजता है और माँ महाकाली का आह्वाहन किया जाता है 
,और एक भब्य मेले का आयोजन किया जाता है ।
हर जगह से लोग इस मेले को देखने के लिया आते है ,और कुमाओं की झलक यहाँ आ के दिखाई देती है ,ढुस्का (चाचरी ) के छठा यहाँ देखाई देती है ,सभी गाव और मुनस्यारी शहर के सभी लोग इस मेले का आनंद लेने के लिये आते है ,यहाँ छोटे से ले के बड़े चाचरी गाते है और मेले का आनन्द लेते है ।






                                  

                                                        Photo By Suresh Kumar

                                                               जय भराडी माँ 

भराडी देवी मन्दिर  मुनस्यारी के हरकोट ग्राम में मलुपाती ग्राम मै आता है , हर साल यहाँ श्रद्धालु आते है और समय समय पर यहाँ पूजा का आयोजन किया जाता है ।
इस मन्दिर मै दूर दूर से लोग आते है ,इस मन्दिर मै जो भी मागो वो सब मिल जाता है , यहाँ सब अपनी मनोकामनाओ को लेकर आते है ।

जय माँ उल्का 
आज जैती गाँव मे माँ उल्का के दरबार पे एक भब्य मेले का आयोजन किया गया था, हर साल माँ भक्त इस पूजा का आयोजन किया जाता है ,हर सभी लोग भाबर से और जो लोग बाहर बस गए है सभी लोग इस मेले और माँ की पूजा मै आते है ,
हर जगह से यहाँ लोग मेला देखने आते है यहाँ पहाडी संस्कृति के जलक दिखाई देती है जोड़ा चाचरी और हुड़के की ताल पे गाया  जाता है ।







                          

                                                          धापा वैली मुनस्यारी ,
धापा गाव मुनस्यारी मै ,दरकोट ग्राम के अंतर्गत आता है  ,धापा दरकोट से आगे  है ,मुनस्यारी से जाने पर मुनस्यारी से १० किलो मीटर लगभग पड़ता है। ,यहाँ से जोहार जाने के लिये रास्ता जा रहा है ,गाव बहुत हे सुन्दर है यहाँ से प्रकर्तिक नज़ारा बहुत ही सुन्दर लगता है  ।

                                                      फोटो हीरा सिंह घिंगा द्वारा 
                                                                   पंचचूली

पंचचूली पर्वत भारत के उत्तराखंड राज्य के उत्तरी कुमाऊं क्षेत्र में एक हिमशिखर शृंखला है। वास्तव में यह शिखर पांच पर्वत चोटियों का समूह है। समुद्रतल से इनकी ऊंचाई ६,३१२ मीटर से ६,९०४ मीटर तक है। इन पांचों शिखरों को पंचचूली-
१ से पंचचूली-५ तक नाम दिये गये हैं।पंचचूली के पूर्व में सोना हिमनद और मे ओला हिमनद स्थित हैं तथा पश्चिम में उत्तरी बालटी हिमनद एवं उसका पठार है। पंचचूली शिखर पर चढ़ाई के लिए पर्वतारोही पहले पिथौरागढ़ पहुंचते हैं। वहां से मुन्स्यारी और धारचूला होकर सोबला नामक स्थान पर जाना पड़ता है। पंचचूली शिखर पिथौरागढ़ में कुमाऊं के चौकोड़ी एवं मुन्स्यारी जैसे छोटे से पर्वतीय स्थलों से दिखाई देते हैं। वहां से नजर आती पर्वतों की कतार में इसे पहचानने में सरलता होती है।

                                                                        पौराणिक आधार
इन पर्वतों के पंचचूली नाम का पौराणिक आधार है। महाभारत युद्घ के उपरांत कई वर्षों तक पांडवों ने सुचारू रूप से राज्य संभाला। वृद्घ होने पर उन्होंने स्वर्गारोहण के लिए हिमालय की ओर प्रस्थान किया। मान्यता है कि हिमालय में विचरण करते हुए इस पर्वत पर उन्होंने अंतिम बार अपना भोजन बनाया था। इसके पांच उच्चतम बिंदुओं पर पांचों पांडवों ने पांच चूल्ही अर्थात छोटे चूल्हे बनाये थे, इसलिए यह स्थान पंचचूली कहलाया। धार्मिक ग्रन्थों में इसे पंचशिरा कहते हैं। कुछ ग्रमीण लोगों की यह मान्यता है कि पाँचों पर्वत शिखर युधिष्ठिर, अर्जुन, भीम, नकुल और सहदेव-पाँचों पांडवों के प्रतीक हैं। शौका लोगों का यह पर्वत बहुत चहेता है, इसलिए इनके लोकगीतों में इसे दरमान्योली के नाम से पुकारा जाता है।

                                                                           पर्वतारोहण
पंचचूली पर्वत की उत्तर-पश्चिम में अक्षांश 30°13'12" और रेखांश 80°25'12" की चोटी पंचचूली-१ कहलाती है।यह चोटी समुद्रतल से ६,३५५ मीटर ऊंची है। पंचचूली प्रथम पर पहली बार १९७२ में आरोहण हुआ था। यहसफल अन्वेषण भारत के भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस के जवानों ने पूरा किया था, जिसका नेतृत्व हुकुमसिंह द्वारा किया गया था। उन्होंने इसके लिए उत्तरी बालटी ग्लेशियर की दिशा का मार्ग अपनाया था। पंचचूली पर्वत के पांच शिखरों में अक्षांश 30°12'51" और रेखांश 80°25'39" पर पंचचूली-२ सर्वोच्च शिखर है। यह शिखर सागरतल से ६,९०४ मीटर ऊंचा है। इस शिखर पर भी पहला सफल अभियान भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस ने १९७३ में किया था। महेन्द्रसिंह के नेतृत्व में यह अभियान बालटी पठार की ओर से शुरू किया गया था। अक्षांश 30°12'00" एवं रेखांश 80°26'24" पर सागरतल से ६,३१२ मीटर ऊंची पंचचूली-३ पर २००१ में दक्षिणपूर्व रिज की ओर से विजय पाई गई थी, जबकि अक्षांश 30°11'24" और रेखांश 80°27'00" पर स्थित पंचचूली-४ पर १९९५ में न्यूजीलैंड के पर्वतारोहियों ने पहली बार विजय प्राप्त की। इसकी ऊंचाई ६,३३४ मीटर है। दक्षिणपूर्व में अक्षांश 30°10'48" और रेखांश 80°28'12" पर स्थित शिखर पंचचूली-५ है। ६,४३७ मीटर ऊंचे इस शिखर पर १९९२ में इंडोब्रिटिश टीम ने दक्षिण रिज की ओर से पहली बार पांव रखा था।[2] इतने ऊंचे पहाड़ों पर अनेक बार बर्फीले तूफान आते हैं। तूफान के साथ कई बार हिमस्खलन (एवलांच) भी आ जाते हैं। सितम्बर २००३ में भारतीय तिब्बत सीमा पुलिस के ९ सदस्य ऐसे ही एक एवलांच में फंस गये थे।


                                                                 Photo by Akhilesh Pradhan

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जय छिपला केदार

छिपला केदार जाने के लिया सबसे पहले सेराघाट से जाना पड़ता है ,जिन का ब्रतपन होना होता है उन को घर से ही नगे पाँव पैदल जाना पड़ता है, और अन्य श्रद्धालु चप्पल पहन कर जा सकते है,बिना ब्रतपन वालो को छिपाला केदार जाने की अनुमति नहीं होती है
     ब्रतपन वालो  घर से सफ़ेद कपडे पहनकर गले मे घंटी लगाकर ,भकोर बजाते हुवे छिपाला केदार की तरफ जाते रहते है ,रास्ते भर शंख बजाते हुवे जाते है और रास्ते मै देवी देवता भी अवतरित होते रहते है
सुबह खर्तोली से जाने पर शाम को ६ बजे तक छिपाला केदार पहुचते है ,
छिपाला केदार पहुचते ही जगतनाथ मन्दिर मै पूजा और आरती होती है और देवता अवतरित होते है और मन्दिर का दरवाजा वहा जाते ही बंद कर दिया जाता है ,जिसे बाद मै देवता खुद खोलते है और छिपाला केदार की पूजा करते है

मन्दिर मै कोई बाहरी सामन नही ले जा सकते मन्दिर मै चमरे का सामन ले जाना मना होता है , चाहे ओ पर्स या बेल्ट ही क्यों न हो
यहाँ तक की खाद्य सामग्री को भी ले जाना भी मनाही है ,फल को छोडकर ,
सभी लोग भानार (गुफा) मै रहते है  जिसमे नए ब्रतपण वाले अलग ही जगह दी जाती है  और लोगो के अलग जगह दी जाती है
 जो भी भनार से बाहर जाता है उसे नहा  के भनार मै आना पड़ता है

यहाँ खाने मै केवल पूरी और सब्जी बनती है वो भी केवल अन्वाल ही बनाते है (बकरी वाले  जो बकरी चराते है )  जो छोटे छोटे होटल खोले रखते है और वहा से खाना पड़ता है

नए ब्रतपन वालो को देवता आशीर्वाद देते है फिर बाल काटन शुरु कर देते है


पी० जी ० कॉलेज मुनस्यारी के नव निर्वाचित पदा धिकरियो और छात्रों ने गांन्धी जयंती के अवसर पर झंडा रोहण के बाद ,  पी० जी ० कॉलेज परिसर की सफाई करी ।
 नव निर्वाचित पदाधिकारियों के यह एक अनोखी पहल है स्वच्छ पर्यावरण होने से पड़ने लिखने मैं मन लगाये रखता है ।

कुछ महात्मा गांन्धी जी के बारे मै जाने -


राष्‍ट्रपिता महात्‍मा गांधी का पूरा नाम मोहनदास करमचंद गांधी था। हम उन्‍हें प्‍यार से बापू पुकारते हैं। इनका जन्‍म 2 अक्‍टूबर 1869 को गुजरात के पोरबंदर में हुआ। सभी स्‍कूलों और शासकीय संस्‍थानों में 2 अक्‍टूबर को इनकी जयंती मनाई जाती है। उन्‍हीं के प्रेरणा से हमारा देश 15 अगस्‍त 1947 को आजाद हुआ। 

गांधीजी के पिता करमचंद गांधी राजकोट के दीवान थे। इनकी माता का नाम पुतलीबाई था। वह धार्मिक विचारों वाली थी। 

उन्‍होंने हमेशा सत्‍य और अहिंसा के लिए आंदोलन चलाए। गांधीजी वकालत की शिक्षा प्राप्‍त करने के लिए इंग्‍लैंड भी गए थे। वहां से लौटने के बाद उन्‍होंने बंबई में वकालत शुरू की। महात्‍मा गांधी सत्‍य और अहिंसा के पुजारी थे। 

एक बार गांधीजी मुकदमे की पैरवी के लिए दक्षिण अ‍फ्रीका भी गए थे। वह अंग्रेजों द्वारा भारतीयों पर अत्‍याचार देख बहुत दुखी हुए। उन्‍होंने डांडी यात्रा भी की। 

गांधीजी की 30 जनवरी को प्रार्थना सभा में नाथूराम गोडसे ने गोली मारकर हत्‍या कर दी। महात्‍मा गांधी की समाधि राजघाट दिल्‍ली पर बनी हुई है।
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