नंदा देवी राज जात

नंदा देवी राज जात

उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक विविधता और समरसता के कारण देश के श्रद्धालुओं,जिज्ञासुओं और शोधार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। नंदा देवी, आकाश को छू लेने वाला शिखर पर्वतारोहियों के साथ साथ  स्थानीय निवासियों के लिए भी श्रद्धा और विश्वास का केंद्र रहा है। इसलिए इसे हिमालय का मोती भी कहा जाता है, गढ़वाल- कुमाऊं  की ईष्ट देवी नंदा  देवी आध्यात्मिक दृष्टि से महाशक्ति भी है।  किसी पर्वत शिखर के साथ इस तरह के जीवित मानवीय और सांस्कृतिक धार्मिक रिश्तों की मिशाल दुर्लभ है। उत्तराखंड की लोक परम्पराओं और अनुश्रुतिओ में इसे कहीं ध्याण( बेटी ) और कहीं माँ के स्वरुप में  पूजा जाता है। पहाड़ के गढ़वाल अंचल में नंदा देवी के प्रमुख मंदिर लाता, नौटी, कुरुड़, कांसुवा, कोटि, कुलसारी, भगौती और  कुमाऊं अंचल में अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर ,रणचूला सनेति, कोटभामरी प्रमुख है।  चमोली अल्मोड़ा एवं नैनीताल के नंदा देवी मेले तो लोक सांस्कृतिक थाती की  सर्वत्र छटा बिखेरते हैं।
नौटी ( कर्णप्रयाग ), कुरुड़ ( घाट) के 26 पड़ाओ (280 किमी पद यात्रा ) से गुजरने वाली यह यात्रा  ज्युरागली के सर्वोच्च शिखर (17500 फीट) पार कर होमकुण्ड में पूजा अर्चना और मेढे की कैलाश की ओर विदाई की जाती है।  इसके पश्चात राजजात यात्रा वापसी में चंदनियाघाट, सुतोल, कनोल, शितेल, घाट के रास्ते सड़क मार्ग से नौटी पहुचती है।  यहाँ पर पूजा -अर्चना और प्रसाद वितरण के साथ यात्रा संपन्न होती है। 
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