मुनस्यारी के छात्र संघ मै चुनाव मै भरत वर्ती रहे विजय रहे , सबसे पहले  अध्यक्ष पद हेतु तीन लोग उठे थे ( रुक्मणि ,बिक्रम,और भरत ) फिर रुक्मणि ने अपना नामाकन वापस ले लिया , विक्रम और भरत दोनों के बीच काटे की टक्कर रही जिसमे भरत ने ८६ वोटो से विक्रम को मात दे दी 


जय नंदा माँ
डाना धार
उत्तराखंड अपनी सांस्कृतिक विविधता और समरसता के कारण देश के श्रद्धालुओं,जिज्ञासुओं और शोधार्थियों के लिए आकर्षण का केंद्र रहा है। नंदा देवी, आकाश को छू लेने वाला शिखर पर्वतारोहियों के साथ साथ  स्थानीय निवासियों के लिए भी श्रद्धा और विश्वास का केंद्र रहा है। इसलिए इसे हिमालय का मोती भी कहा जाता है, गढ़वाल- कुमाऊं  की ईष्ट देवी नंदा  देवी आध्यात्मिक दृष्टि से महाशक्ति भी है।  किसी पर्वत शिखर के साथ इस तरह के जीवित मानवीय और सांस्कृतिक धार्मिक रिश्तों की मिशाल दुर्लभ है। उत्तराखंड की लोक परम्पराओं और अनुश्रुतिओ में इसे कहीं ध्याण( बेटी ) और कहीं माँ के स्वरुप में  पूजा जाता है। पहाड़ के गढ़वाल अंचल में नंदा देवी के प्रमुख मंदिर लाता, नौटी, कुरुड़, कांसुवा, कोटि, कुलसारी, भगौती और  कुमाऊं अंचल में अल्मोड़ा, नैनीताल, बागेश्वर ,रणचूला सनेति, कोटभामरी प्रमुख है।  चमोली अल्मोड़ा एवं नैनीताल के नंदा देवी मेले तो लोक सांस्कृतिक थाती की  सर्वत्र छटा बिखेरते हैं।
नौटी ( कर्णप्रयाग ), कुरुड़ ( घाट) के 26 पड़ाओ (280 किमी पद यात्रा ) से गुजरने वाली यह यात्रा  ज्युरागली के सर्वोच्च शिखर (17500 फीट) पार कर होमकुण्ड में पूजा अर्चना और मेढे की कैलाश की ओर विदाई की जाती है।  इसके पश्चात राजजात यात्रा वापसी में चंदनियाघाट, सुतोल, कनोल, शितेल, घाट के रास्ते सड़क मार्ग से नौटी पहुचती है।  यहाँ पर पूजा -अर्चना और प्रसाद वितरण के साथ यात्रा संपन्न होती है। 

कहा जाता है कि भगवान विश्वकर्मा ने ही इन्द्रपुरी, यमपुरी, वरुणपुरी, कुबेरपुरी, पाण्डवपुरी, सुदामापुरी, शिवमण्डलपुरी आदि का निर्माण किया था. पुष्पक विमान का निर्माण तथा सभी देवों के भवन और उनके दैनिक उपयोग में आने वाली वस्तुएं भी भगवान विश्रकर्मा द्वारा ही बनाई गई हैं. कर्ण का कुण्डल, विष्णु भगवान का सुदर्शन चक्र, शंकर भगवान का त्रिशूल और यमराज का कालदण्ड इत्यादि वस्तुओं का निर्माण भगवान विश्वकर्मा ने ही किया है.

पूजन विधि
भगवान विश्वकर्मा जी का एक मंत्र है. कहते हैं उस मंत्र के जाप के बिना विश्वकर्मा जी की आरती और पूजन पूरा नहीं माना जाता है.
ओम आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम:ओम् अनन्तम नम:पृथिव्यै नम:

भारतीय परमपराओं में भगवान विश्वकर्मा की पूजा और यज्ञ पूरे विधि-विधान से किया जाता है. भगवान विश्वकर्मा जी की पूजन विधि यह है कि यज्ञकर्ता पूरे विश्वास के साथ अपनी पत्नी सहित पूजा स्थान पर बैठे. इसके बाद विष्णु भगवान का ध्यान करे और फिर बाद में हाथ में पुष्प, अक्षत लेकर – ओम आधार शक्तपे नम: और ओम् कूमयि नम:; ओम् अनन्तम नम:, पृथिव्यै नम: ऐसा कहकर चारो ओर अक्षत छिड़के और पीली सरसो लेकर चारो दिशाओं को बंद कर दे. अपने आप को रक्षासूत्र बांधे एवं पत्नी को भी बांधे और साथ ही पुष्प जलपात्र में छोड़े. इसके बाद हृदय में भगवान विश्वकर्मा का ध्यान करे.

पूरे विश्वास के साथ रक्षादीप जलाये, जलद्रव्य के साथ पुष्प एवं सुपारी लेकर संकल्प करे. शुद्ध भूमि पर अष्टदल कमल बनाए. उस स्थान पर सप्त धान्य रखे और उस पर मिट्टी और तांबे का जल डाले. इसके बाद पंचपल्लव, सप्त मृन्तिका, सुपारी, दक्षिणा कलश में डालकर कपड़े से कलश का आच्छादन करे. चावल से भरा पात्र समर्पित कर ऊपर विश्वकर्मा बाबा की मूर्ति स्थापित करे और वरुण देव का आह्वान करे. भगवान विश्वकर्मा जी को पूरे विश्वास के साथ पुष्प चढ़ाकर कहना चाहि – ‘हे विश्वकर्मा जीइस मूर्ति में विराजिए और मेरी पूजा स्वीकार कीजिए. इस प्रकार पूजन के बाद विविध प्रकार के औजारों और यंत्रों आदि की पूजा कर हवन यज्ञ करना होता है.
आरती श्री विश्वकर्मा जी की
हम सब उतारे आरती तुम्हारी हेविश्वकर्माहे विश्वकर्मा
युग-युग से हम हैं तेरे पुजारीहे विश्वकर्मा…..
मूढ़ अज्ञानी नादान हम हैंपूजा विधि से अनजान हम हैं.
भक्ति का चाहते वरदान हम हैंहे विश्वकर्मा……
निर्बल हैं तुझते बल मांगते हैंकरुणा का प्यास से जल मांगते हैं.
श्रद्धा का प्रभु जी फ़ल मांगते हैंहे विश्वकर्मा……..
चरणों से हमको लगाये ही रखनाछाया में अपने छुपाये ही रखना.
धर्म का योगी बनाये ही रखनाहे विश्वकर्मा…..
सृष्टि में तेरा हे राज बाबाभक्तों की रखना तुम राज बाबा.
धरना किसी का  मोहताज बाबाहे विश्वकर्मा…..
धनवैभवसुख-शान्ति देनाभयजन-जंजाल से मुक्ति देना.
संकट से लड़ने की शक्ति देनाहे विश्वकर्मा…….
तुम विश्वपालकतुम विश्वकर्तातुम विश्वव्यापक तुम कष्ट हर्ता.
तुम ज्ञानदानी भण्ड़ार भर्ताहे विश्वकर्मा…..

है भव्य भारत ही हमारी मातृभूमि हरी भरी
हिंदी हमारी राष्ट्रभाषा और लिपि है नागरी

हर इंसान की एक पहचान होती है. यह पहचान कई रूपों में होती है लेकिन जो चीज सबसे पहले झलकती है वह है उस इंसान की बोली. मसलन अगर कोई पंजाबी है तो यह उसके बोलते ही पता चल जाएगा इसी तरह अगर कोई अंग्रेज है तो उसके बोलने का तरीका ही बता देगा कि उसकी असल पहचान क्या है. इसी तरह एक हिंदुस्तानी की असली पहचान हिंदी  भाषा होती है.

हिन्दी ना सिर्फ हमारी मातृभाषा है बल्कि यह भारत की राजभाषा भी है. संविधान ने 14 सितंबर, 1949 को हिन्दी को भारत की राजभाषा घोषित किया था. भारतीय संविधान के भाग 17 के अध्याय की धारा 343 (1) में यह वर्णित है कि “संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी. संघ के राजकीय प्रयोजनों के लिए प्रयोग होने वाले अंकों का रूप अंतर्राष्ट्रीय  होगा.

इसके बाद साल 1953 में हिन्दी को हर क्षेत्र में प्रसारित करने के लिये राष्ट्रभाषा प्रचार समिति, वर्धा के अनुरोध पर सन् 1953 से संपूर्ण भारत में 14 सितंबर को प्रतिवर्ष हिन्दी दिवस के रूप में मनाया जाता है.

यह तो बात थी आजाद भारत में हिन्दी के महत्व की लेकिन हिन्दी का इतिहास आजादी के सदियों साल पुराना है. हम हिन्दी को राष्ट्रभाषा मानते हैं. इसके बिना हमारी कोई पहचान ही नहीं है. संसार में चीनी के बाद हिन्दी सबसे विशाल जनसमूह की भाषा है. भारत में अनेक उन्नत और समृद्ध भाषाएं हैं किंतु हिन्दी सबसे अधिक व्यापक क्षेत्र में और सबसे अधिक लोगों द्वारा समझी जाने वाली भाषा है.

जैसा कि हम पहले ही कह चुके हैं कि राष्ट्रभाषा किसी भी देश की पहचान और गौरव होती है लेकिन भारत जो करीब दो सौ सालों तक अंग्रेजों का गुलाम रहा उसने अपनी इस अनमोल विरासत को कहीं खो सा दिया है. आलम यह है कि आज हिन्दी भाषा गौरव की नहीं बल्कि शर्म की भाषा होती जा रही है. प्रगति और विकास की राह में लोग हिन्दी को तुच्छ मानते हैं. टेक्नॉलोजी और विज्ञान के इस दौर में आपने इंग्लिश स्पीकिंग कोर्सों की दुकान तो बहुत देखी होगी लेकिन हिन्दी सिखाने के लिए प्राइवेट कोचिंग सेंटर तो दूर टीचर भी नहीं मिलते.

आज हर भारतीय अपने बच्चों को आगे बढ़ाने के लिए अच्छी से अच्छी शिक्षा की वकालत करता है और अच्छे स्कूल में डालता है. इन स्कूलों में विदेशी भाषाएं तो बखूबी सिखाई जाती हैं लेकिन हिन्दी की तरफ कोई खास ध्यान नहीं दिया जाता वजह और कारण बेहद हास्यपद हैं. कुछ लोगों का कहना होता है कि “हिन्दी का मार्केट थोड़ा डाउन है और आगे जाकर इसमें कोई खास मौके नहीं मिलते.”

आज देश में हर दूसरा न्यूज चैनल हिन्दी में आता है. हजारों अखबार हिन्दी में छपते हैं. लेकिन फिर भी नौकरियों की कमी है. लेकिन हिन्दी का समर्थन करने का मतलब यह नहीं है कि आप अन्य भाषाएं सीखें ही ना. हिन्दी भाषा का सम्मान करने का अर्थ है आपको हिन्दी आनी चाहिए और सार्वजनिक स्थलों पर हिन्दी में वार्तालाप करने में आपको शर्म या झिझक नहीं होनी चाहिए.

आज “हिन्दी दिवस” जैसा दिन मात्र एक औपचारिकता बन कर रह गई है जब लोग गुम हो चुकी अपनी मातृभाषा के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं वरना क्या कभी आपने चीनी दिवस या फ्रेंच दिवस या अंग्रेजी दिवस के बारे में सुना है. हिन्दी दिवस मनाने का अर्थ है गुम हो रही हिन्दी को बचाने के लिए एक प्रयास.

प्यारे पाठकों, आज का युवा अपनी जमीन से तो दूर होता ही जा रहा है लेकिन अगर वह अपने वजूद और अपनी पहचान को भी खो दे तो यह अच्छा नहीं होगा. एक हिन्दुस्तानी को कम से कम अपनी भाषा यानि हिन्दी तो आनी ही चाहिए. साथ ही हमें हिन्दी का सम्मान भी करना सीखना होगा.

मुनस्यारी प्रास्नातक  विद्यालय मे आज कल चुनाव का प्रचार प्रसार बहुत जोर सोर से हो रहा है , यहाँ तक की सोशियल मीडिया मे भी इस का प्रचार जोर शोर से चल रहा है मुनस्यारी पी जी कॉलेज मै ।
 अध्यक्ष पद हेतु रुक्मणी पापड़ा , भरत सिंह ,बिक्रम सिंह दानू , ये तीन प्रतिभागी  है ।
आप पे निर्भर करता है आप किसे अपना मत देते हो और किसे अध्यक्ष बनाते हो । तीनो  बीच बहुत ही काटे की टक्कर है ।

                                अब आप की आप बारी की आप किसे अपना अध्यक्ष बनाते हो !!


मानो तो भगवान ,न मानो तो पत्थर हूँ मैं ,
तुम्हारी ही आस्था से बना हूँ मैं ,तुम्हारी ही ताक़त से बना हूँ मैं ,
काले बादलो को चीर कर एक सुनहरी किरण
तुम्हारी ज़िन्दगी मै लाने के लिये बना हुवा हूँ मैं

नहीं चाहिए किसी भी प्रकार का लोभ मुझे ,
नहीं चाहिये किसी भी प्रकार के छ्पन भोग ,
बस एक पल मुझे भी याद कर ले ,
मेरी भक्ती मै कुछ पल मेरे नाम कर ले ,

तू जानता नहीं कितना चाहते है तुझे,
लेकिन तुम लोगो ने आपस मै न जाने कितने धर्म
बना लिए ,न जाने कितने मज़हब बना लिये ,
आपस मै ही लड़ते हो न जाने ऐसा क्यू करते हो ,

मैंने दिया है तुमको एक सुन्दर जीवन ,इस जीवन मै कुछ अच्छा करो ,
बे सहारो को सहारा दो ,भूखे को खाना दो , यू अपना जीवन दूसरो के नाम करो ,

हिमालय, सांस्कृतिक, जातीय, पारिस्थितिकी और आर्थिक मूल्यों के आधार पर देश की आत्मा किया गया है। यह केवल देश की सीमा की रखवाली लेकिन लगातार हमेशा राष्ट्र के समग्र विकास में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका के लिए कम करके आंका गया था मिट्टी, हवा, पानी आदि हिमालय का दुर्भाग्य महत्व को समृद्ध बनाने के द्वारा अपने मानव की सेवा नहीं की गई है। कारण अपर्याप्त ध्यान करने के लिए हिमालय की प्रणाली की गिरावट हमारे जीवन का समर्थन संसाधन की धमकी दी है। वन, जल की स्थिति, हवा मिट्टी चिंताजनक गंभीर हो गया है। गंभीरता से संज्ञान में लाया जा करने की जरूरत है कि दो तथ्य हैं। जीवन प्राकृतिक संसाधनों के बिना नहीं रह सकता और हिमालय उसी के प्रमुख दाता है। हिमालय स्वास्थ्य काफी हद तक जलवायु, अर्थव्यवस्था और देश की पारिस्थितिकी का फैसला करता है के बाद से, अपने मूल करने के लिए पर्याप्त ध्यान उत्तरार्द्ध आकार इसकी पारिस्थितिकी और पर्यावरण के रूप में समान रूप से महत्वपूर्ण हो जाते हैं।

हिमालय समुदायों हमेशा उनके समकक्ष का आनंद लिया है, जो किसी भी व्यापक विकास से वंचित कर दिया गया था। वे अतीत में नुकसान उठाना पड़ा है, बल्कि इसलिए कि उनकी निष्कपटता के विरोध कभी नहीं। हिमालयी राज्यों के लिए राज्य का दर्जा बिल्कुल सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों का समाधान करने की पहल की गई है, बल्कि इसलिए कि अनुचित दृष्टिकोण की, इच्छा विकास के पैमाने रन नहीं किया जा सका।

इस मुद्दे को दो मोर्चों में बहस का मुद्दा है। एक प्रकृति वस्तु या उसके निवासियों को अपने व्यवहार के लिए निर्णय लेने प्रणाली के अभिन्न हिस्सा माना जाना चाहिए के रूप में चाहे हिमालय केवल अलगाव में विचार किया जाना चाहिए। हिमालयी विकास इसके मूल के राज्य के साथ-साथ मापा जाना चाहिए।

यह समुदायों की सेवा करने के लिए हिमालय और उसके efficacies की स्थिति पर एक बहस खोलने के लिए समय आ गया है। वहाँ हिमालय संसाधनों के संरक्षण के लिए आंदोलनों का एक नंबर दिया गया है, लेकिन दुर्भाग्य से वे हिमालय की गरिमा को बचाने में दावा करने के लिए काफी नहीं है। यह अक्सर अब हिमालय की बचत इसके मूल केवल की जिम्मेदारी है कि क्या resonate है? हिमालय का बड़ा लाभ यह है कि एक जल, जंगल या मिट्टी होने के अपने समकक्ष से ले लिया गया है। इन संसाधनों तेजी से सिकुड़ता जा रहा है और परम खामियाजा हम में से हर किसी के द्वारा पैदा किया गया है।

हिमालय, क्योंकि कायम पूरे देश की जरूरतों की रखवाली कर और खानपान संसाधन का ध्यान लायक हो। इस समुदाय है, जो न्याय के उच्चतम शरीर के साथ राष्ट्रीय स्तर पर एक गंभीर चर्चा के लिए कहता है।

स्रोत: HESCO प्रेस विज्ञप्ति

हिमालय दिवस के समारोह पर समाचार

INews: नई दिल्ली, 9 सितंबर (आईएएनएस) एक अलग मंत्रालय वनों की कटाई और बढ़ते प्रदूषण की तरह पारिस्थितिक खतरों का सामना करना पड़ता है, जो हिमालय, के लिए स्थापित किया जाना चाहिए, पर्यावरणविदों के एक समूह शुक्रवार का सुझाव दिया।

'हिमालय धीरे-धीरे की वजह से प्रदूषण बढ़ रही है बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियों के लिए मर रहे हैं। हिमालयी क्षेत्रों के लिए केंद्र सरकार में एक अलग मंत्रालय समय की मांग है, 'अनिल जोशी, हिमालय पर्यावरण अध्ययन एवं संरक्षण संगठन (HESCO) के संस्थापक ने कहा।

पर्यावरणविद् के एक समूह ने हिमालय दिवस के रूप में 9 सितंबर को मनाने के लिए राष्ट्रीय राजधानी में एकत्र हुए।

दिन वृद्धि की वजह से मानव हस्तक्षेप करने के लिए पारिस्थितिक खतरे में हैं, जो हिमालय की बुलंद पर्वतमाला को बचाने के लिए जागरूकता लाने के लिए 2010 में कार्यकर्ताओं द्वारा चुना गया था।

'हम राष्ट्रीय पर्यावरण के समग्र इमारत में हिमालय के महत्व के प्रति आम नागरिकों का ध्यान आकर्षित करने की कोशिश कर रहे हैं,' जोशी ने कहा।

प्रसिद्घ पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा ने कहा: 'हिमालय में गड़बड़ी अकेले हिमालय समुदायों के लिए एक चिंता का विषय नहीं है। प्राचीन हिमालय का संरक्षण देश के प्रत्येक नागरिक की जिम्मेदारी होनी चाहिए। '

'हिमालय और गैर-हिमालयी दोनों समुदायों में शामिल होने और हिमालय की degenerating हालत में सुधार करना चाहिए, उन्होंने कहा।

ग्रीन्स हिमालय के लिए एक मंत्रालय चाहते हैं

टाइम्स ऑफ इंडिया: एन स्वतंत्र मंत्रालय निकट भविष्य में पूरे देश को प्रभावित करेगा fallouts जिनमें से अद्वितीय पारिस्थितिकी खतरों का सामना कर रहा है, जो हिमालय क्षेत्र, के लिए स्थापित किया जाना चाहिए, पर्यावरणविदों और सामाजिक कार्यकर्ताओं के एक समूह ने शुक्रवार को कहा।

हिमालय दिवस के रूप में 9 सितंबर चिह्नित, समूह क्षेत्र राष्ट्रीय नेताओं, नीति निर्माताओं और लोगों की तत्काल हस्तक्षेप की जरूरत है।

"हिमालय बड़े पैमाने पर व्यावसायिक गतिविधियों के लिए, पनबिजली परियोजनाओं के एक नंबर जलवायु परिवर्तन से उत्पन्न प्रमुख नदियों, वन गिरावट और धमकियों पर आ वजह से मर रहे हैं। हिमालयी क्षेत्रों पहाड़ियों को बचाने के लिए एक रणनीति तैयार करने के लिए केंद्र सरकार एक अलग मंत्रालय की स्थापना करनी चाहिए, "हिमालय एकता आंदोलन के अनिल जोशी से मिलने का आयोजन किया है कि पर्यावरण और सामाजिक संगठनों की एक छतरी के शरीर कहा। पीडी राय, सिक्किम से सांसद, योजना आयोग में हिमालयी क्षेत्र के लिए काम कर रहे एक समूह गठित करने का प्रस्ताव है। ग्रामीण विकास अगाथा संगमा और पर्यावरणविद् सुंदरलाल बहुगुणा के लिए राज्य के मंत्री भी इस अवसर पर अपने विचार रखे।





'श्रीकृष्ण जन्माष्टमी' हिन्दुओं का एक प्रसिद्द त्यौहार है। यह त्यौहार हिन्दू कैलेण्डर के अनुसार भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की अष्टमी को मनाया जाता है। इसे भगवान् श्री कृष्ण के जन्म दिन के रूप में मनाते हैं। जन्माष्टमी को गोकुलाष्टमी, कृष्णाष्टमी, श्रीजयंती के नाम से भी जाना जाता है। महाराष्ट्र में जन्माष्टमी दही हांडी के लिए विख्यात है।

                                कृष्ण जन्मकथा
श्रीकृष्ण का जन्म भाद्रपद कृष्ण अष्टमी की मध्यरात्रि को रोहिणी नक्षत्र में देवकी व श्रीवसुदेव के पुत्र रूप में हुआ था. कंस ने अपनी मृत्यु के भय से अपनी बहन देवकी और वसुदेव को कारागार में कैद किया हुआ था. कृष्ण जी जन्म के समय घनघोर वर्षा हो रही थी. चारो तरफ़ घना अंधकार छाया हुआ था. भगवान के निर्देशानुसार कुष्ण जी को रात में ही मथुरा के कारागार से गोकुल में नंद बाबा के घर ले जाया गया.

नन्द जी की पत्नी यशोदा को एक कन्या हुई थी. वासुदेव श्रीकृष्ण को यशोदा के पास सुलाकर उस कन्या को अपने साथ ले गए. कंस ने उस कन्या को वासुदेव और देवकी की संतान समझ पटककर मार डालना चाहा लेकिन वह इस कार्य में असफल ही रहा. दैवयोग से वह कन्या जीवित बच गई. इसके बाद श्रीकृष्ण का लालन–पालन यशोदा व नन्द ने किया. जब श्रीकृष्ण जी बड़े हुए तो उन्होंने कंस का वध कर अपने माता-पिता को उसकी कैद से मुक्त कराया.



   जय माँ भगवती 
होकरा देवी मंदिर ,ग्राम होकरा ,मुनस्यारी ब्लॉक के अंतर्गत आता है । मंदिर जाने के लिये ककर सिंह बैंड से रोड जाती है जो माँ भगवती के मंदिर तक जाती है ।
हर साल यहाँ माँ भगवती के पूजा के जाती है और भब्य मेले का आयोजन किया जाता है , माँ के मंदिर पर देश विदेश से लोग अपनी इच्छा पूर्ती के लिए आते है । माँ के घर से कोई भी खाली हाथ नही जाता है ।

 श्री दुर्गा मन्त्र

ॐ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ॥
ॐ ग्लौं हुं क्लीं जूं सः ज्वालय ज्वालय ज्वल ज्वल प्रज्ज्वल प्रज्ज्वल
ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ज्वल हं सं लं क्षं फट्‍ स्वाहा ॥
नमस्ते रुद्ररूपिण्यै नमस्ते मधुमर्दिनी ।
नमः कैटभहारिण्यै नमस्ते महिषार्दिनी ॥1॥
      
नमस्ते शुम्भहन्त्रयै च निशुम्भासुरघातिनी ।
जाग्रतं हि महादेवि जपं सिद्धं कुरुष्व मे ॥2॥
      
ऐंकारी सृष्टिरुपायै ह्रींकारी प्रतिपालिका ।
क्लींकारी कामरूपिण्यै बीजरूपे नमोऽस्तु ते ॥3॥

चामुण्डा चण्डघाती च यैकारी वरदायिनी ।
विच्चे चाभयदा नित्यं नमस्ते मन्त्ररूपिणी ॥4॥

धां धीं धूं धूर्जटेः पत्नी वां वीं वूं वागधीश्वरी ।
क्रां क्रीं  क्रूं कालिकादेवि शां शीं शूं मे   शुभं कुरु ॥5॥



Next PostNewer Posts Previous PostOlder Posts Home